डूंगला। क्षेत्र के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल किशन करेरी स्थित द्वारकाधीश मंदिर का दो दिवसीय विशाल मेला सोमवार से प्रारंभ होगा।

किशन करेरी में प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी हर्षोल्लास के साथ जलझुलनी एकादशी का दो दिवसीय मेला आयोजित हो रहा है।मेले के तहत सोमवार को रात्रि जागरण एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम होगा जिसमें मां चामुंडा म्यूजिकल ग्रुप सिंहपुर द्वारा प्रस्तुतियां दी जाएगी। इसमें विशेष कलाकार काजल, कृष्णा, खुशी, कोमल रंगीली के साथ समीर लाडला होंगे। इसके बाद मंगलवार को जल झुलनी एकादशी को मंगला आरती के पश्चात दिन में उपहार योजना का ड्रा खोला जाएगा एवं इसके पश्चात प्रभु श्री द्वारिकाधीश महाजुलूस द्वारा डीजे बाजे एवं भक्तों के भाव नृत्य के साथ सरोवर स्नान करने को जायेंगे। तालब पर ग्रामीणों द्वारा मेवाड़ की गवरी का मंचन किया जाएगा एवं शाम को भगवान भक्त के घर पांवणा होंगे। इसके बाद रात्रि 8 बजे से विशाल भजन संध्या का आयोजन होगा जिसमें मारवाड़ के प्रसिद्ध गायक महेंद्र सिंह राठौड़, श्रृष्टि जांगिड़ एवं खुशी देवासी अपनी प्रस्तुतियां देंगे।
मंदिर कि इतिहास –
डूंगला उपखंड का किशन करेरी गांव द्वारिकानगरी के नाम से भी प्रख्यात है यहां श्री द्वारिकाधीश की प्राचीन प्रतिमा मंदिर में विराजित हैं यह प्रतिमा सैकड़ों वर्षों पूर्व पक्षी विहार तालाब किशन करेरी से खुदाई में निकली थी जिसके बाद इसे गांव के बीच निर्माणाधीन मंदिर में बैठा दिया गया, तब से लेकर वर्षभर में लाखों श्रद्धालु दर्शन लाभ लेने के लिए आते हैं। भादवा मास की जल जुलनी एकादशी पर प्रभु श्री द्वारिकाधीश सरोवर पर स्नान करने या जुलने जाते इस उपलक्ष्य में विशाल मेले का आयोजन होता है।
प्राचीन इतिहास: किंवदंती के अनुसार संवत् 1122 की बात है जब एक ब्राह्मण जोड़ा गुजरात द्वारिका दर्शन करने को जा रहा था। इस यात्रा के दौरान रात्रि विश्राम करेरी गांव में किया जहां उन्हें रात्रि में भगवान द्वारकाधीश ने दर्शन दिए और कहा कि तुम्हे मै यही दर्शन दूंगा। गांव के पश्चिम दिशा में तालाब में दर्शाई गई भूमि पर खुदाई करना। गांव वालों की सहायता से उस ब्राह्मण जोड़े ने खुदाई करी जिसमें स्वयं श्री द्वारिकाधीश जी एवं भैरू जी की प्रतिमा निकली जो वर्तमान में मंदिर में स्थापित है। खुदाई में प्राप्त प्रतिमा को गांव के निर्माणाधीन मंदिर में विराजित कर दिया गया। प्रतिमा के विराजित होने से लेकर वही ब्राह्मण हरदेव जी तिवाड़ी सेवा पूजा करने लग गए और तब से लेकर आज तक उसी ब्राह्मण के वंशज सेवा पूजा करते हैं। इसके साथ ही गांव में तब से ही नियम बन गया था जो आज तक चल रहा है कि इस गांव से कोई भी द्वारिका दर्शन को नहीं जाते है। इसके साथ ही इस गांव में बैल की नसबंदी नहीं होती है ऐसे कई प्राचीन नियम के साथ आज भी यह गांव क्षेत्र में द्वारिकानगरी के नाम से भी प्रख्यात है एवं लाखों श्रद्धालुओ की आस्था का केंद्र है









